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Sunday, June 23, 2024

चुनावों मे मिली अप्रत्याशित असफलता की बात

 चाहे चुनावों मे मिली अप्रत्याशित असफलता की बात हो, चाहे पेपरलीक की, या शाहीनबाग से शुरू होकर किसान आंदोलन से होते हुए देश भर मे अलग अलग स्थानों पर निरंतर हो रहे उपद्रव और अशांति की — इन सारी बातों मे कुछ तो है जो कॉमन है - इनमे कोई तो पैटर्न है, और यह जो भी हो रहा है वह कहीं से प्राकृतिक नही लगता।


पिछले कुछ वर्षों मे जमीनी परिस्थितियों मे तेजी से बदलाव हुए, और उन पर प्रधान साब की पकड़ ढीली पड़ती दिखी। जिन चीजों पर सत्ता की पैनी नजर होनी चाहिये थी और गड़बड़ी की शुरुआत होते ही सरकार को झपट्टा मार कर उन्हे और उसके पीछे के मास्टरमाइंड्स को ‘फिक्स’ करना चाहिये था — उन्हे अज्ञात कारणों से मौन रह कर होते रहने दिया गया, जरा भी हस्तक्षेप करने की चेष्टा नही की गयी। और उसका परिणाम एक ऐसी स्थिति के रूप मे निकल रहा है जिसे आर्थिक और कॉर्पोरेट जगत मे “डॉमिनो इफेक्ट” के नाम से जाना जाता है (जब एक घटना समान, संबंधित या जुड़ी हुई घटनाओं की एक श्रृंखला को ट्रिगर करती है)।


आज सरकार और देश जहां खड़े हैं वहाँ भी अभी तक बहुत अधिक क्षति नही हुई है, और अबसे भी स्थितियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। हालाँकि इसके लिये सरकार के पास समय कम है — दोबारा से कंट्रोल हासिल करने के लिये उसे कम से कम समय मे बिना कोई नयी गलती किये अधिक से अधिक निर्णायक कार्यवाहियाँ करनी पड़ेंगी। यह थोड़ा कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नही है।


एक साथ सौ मोर्चों पर लड़ना कठिन होता है, और कुछ मुट्ठी भर ही शक्तियाँ हैं जिन्होने सरकार के खिलाफ एक साथ सौ मोर्चे खोल देने की रणनीति अपनाई हुई है। फिलहाल सरकार को विकास, GST टार्गेट्स, 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था, विश्वगुरु. . . वगैरह जैसी हर बात साइड रख देनी चाहिये, और सौ फ्रंट्स के डिल्यूजन मे उलझने की बजाय अपना सारा फोकस उन मुट्ठी भर किंगपिन्स को चिन्हित कर लेने और फिर उनका सघन उपचार कर उन्हे न्यूट्रलाइज करने पर होना चाहिये। सामने भले आपको सौ मेघनाद खड़े दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनमे से एक ही वास्तविक है और शेष सारे मायारचित दृष्टिभ्रम. . . यदि आपने उस एक को ही ठीक ठीक पहचान कर उसका शीश काट गिराया, तो उसकी माया तत्क्षण नष्ट हो जायेगी और शेष निन्यानबे गायब।


अब जबकि मेरे जैसा सामान्य नागरिक भी उस एक महान शत्रु को भली भाँति पहचानता हो, तो यह विश्वास कर पाना कठिन है कि सत्ताशीर्ष पर बैठा हमारा चंद्रगुप्त उसे जानता नही होगा या उसके शमन का उपाय उसके पास नही होगा। पॉलिटिकल करेक्टनेस का लुभावना स्वाँग छोड़ने मे - अबसे भी भेद और दंड नीति अपनाने मे यदि सकुचाते रहेंगे, तो आप केवल अपनी सत्ता नही खोयेंगे, बल्कि सत्ता भारतद्रोही तत्वों के हाथ जाने देकर आप प्रकारांतर से जो पाप कर रहे होंगे उसके लिये आपको भी कहीं न कहीं देश की जड़ मे मट्ठा डालने का - एंटीनेशनल होने का दोषी ही माना जायेगा, कोई आत्मोत्सर्ग करने वाला बलिदानी वीर नही।


एक बार सभी झमेलों को परे झटक कर ठंडे दिमाग से सोचिये कि मै क्या कह रहा हूँ. . . और उसके बाद सावधानी से अपने विकल्प चुनिये - वे दिखने मे कितने ही अप्रिय और कठोर क्यों न लगें - तो भी उन्हे चुनिये. . . क्योंकि —


1)- अन्य कोई उपाय नही है।

2)- और देश से बड़ा कुछ भी नही है — न आपका धूर्त शत्रु, न आपकी बड़े प्रयत्नों से तैयार की हुई महात्मा वाली छवि ही।


अजातशत्रु युधिष्ठिर कहलाने का मोह छोड़िये, गांडीव उठाइये और घोरकर्मा अर्जुन के लिये नियत कार्यों का संपादन कर अपनी सेनाओं, प्रजा, और देश को अभय दीजिये। 🙏🏻🙏🏻




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