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Friday, July 5, 2024

माथे पर कुमकुम लगाए हुए एक सांवले रंग के आदमी को बहुत लोगों ने नोटिस किया होगा। विश्व कप के दौरान भी भारतीय टीम के आसपास अक्सर

 माथे पर कुमकुम लगाए हुए एक सांवले रंग के आदमी को बहुत लोगों ने नोटिस किया होगा। विश्व कप के दौरान भी भारतीय टीम के आसपास अक्सर ये सज्जन दिखाई पड़ जाते थे। आम सी शक्ल और कद काठी के इस इंसान को देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि विराट कोहली जैसा खिलाड़ी इनको अपनी कामयाबी की वजह बताता है। इसी वर्ल्ड कप में रोहित शर्मा ने जब पेट कमिंस जैसे तेज गेंदबाज को घुटने पर बैठ कर स्टेडियम की छत पर छक्का मारा तो कई पुराने दर्शकों को वो दौर याद आया होगा जब भारतीय खिलाड़ियों की सबसे बड़ी कमजोरी तेज गेंदबाजी हुआ करती थी। पर आज हम भारतीय क्रिकेट के ऐसे दौर में हैं जहां ऋषभ पंत जेम्स एंडरसन जैसे गेंदबाज को रिवर्स स्वीप ऐसे मारते हैं जैसे दाल चावल का निवाला हो। इंडियन बैट्समैन फास्ट बोलिंग के सामने आज अचानक से बेखौफ नही हुए हैं, बल्कि इसके पीछे एक इंसान की ग्यारह साल की मेहनत का कमाल है। इस आदमी का नाम है डी राघवेंद्र, प्यार से इंडियन प्लेयर्स इन्हे रघु बुलाते हैं।


कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले के रघु भी करोड़ों भारतीयों की तरह एक क्रिकेटर बनना चाहते थे, और करोड़ों भारतीयों की तरह उनके पिता को भी क्रिकेट बर्बादी का शौक लगता था। एक दिन ऐसे ही गुस्से में रघु के पिता ने लास्ट वार्निंग दे दी क्रिकेट छोड़ने की। फिर एक बैग और जेब में 21 रुपए लेकर रघु घर से निकल गए। एक हफ्ते हुबली के बस स्टैंड पर सोए, वहां से जब पुलिस ने भगाना शुरू किया, तो रघु भाग कर एक मंदिर में रहने लगे , पर वहां भी ज्यादा दिन ठिकाना बना नहीं, फिर वहां से निकलकर उन्होंने एक श्मशान में अपना ठिकाना बनाया और वहीं साढ़े चार साल तक एक टूटे कमरे में रहते रहे। भूखे पेट भी रघु को यही लगता कि अब क्रिकेटर बन कर ही घर जायेंगे। उनके सपने को भूख तो नहीं तोड़ पाई पर एक हादसे में उनका दायां हांथ टूट गया। बोलिंग का सपना चकनाचूर होने के बावजूद रघु घर नहीं लौटे, क्यूंकि उन्हे अपने सपने, अपने प्यार क्रिकेट के ही आस पास रहना था चाहे जिस रूप में रहें।


हुबली में ही वो दूसरे क्रिकेटर्स को बोलिंग प्रैक्टिस कराने लगे,फिर एक दोस्त के कहने पर बंगलोर गए। वहां कर्नाटक क्रिकेट इंस्टीट्यूट में क्रिकेटर्स को प्रैक्टिस कराते हुए ऐसे ही एक दिन वो जवागल श्रीनाथ की नजर में आ गए। वहां से कर्नाटक रणजी टीम का हिस्सा बने और फिर चिन्नास्वामी में नेशनल क्रिकेट एकेडमी में बिना किसी तनख्वाह के तीन चार साल काम करते रहे। एनसीए में ही उन्होंने कोचिंग का कोर्स पूरा किया और वहां आने वाले इंडियन क्रिकेटर को प्रैक्टिस कराने लगे। एक दिन उन पर सचिन की नजर पड़ी, सचिन को समझ आया कि प्रैक्टिस कराना रघु के लिए काम नहीं बल्कि जुनून है। वहां से 2011 में वो भारतीय क्रिकेट के स्टाफ का हिस्सा बन गए। उसी दौरान रोबो आर्म नाम के एक इक्विपमेंट से क्रिकेटर्स प्रैक्टिस करते थे, रघु ने इस रोबो आर्म से गेंद फेंकने में बहुत महारत हासिल कर ली, धीरे धीरे रघु की एक्यूरेसी इतनी सटीक होती चली गई, कि उनकी गेंद 155 km की रफ्तार से किसी इंटरनेशनल गेंदबाज की तरह प्रैक्टिस पिच पर गिरती थी।


रघु ही वो वजह हैं जिनकी 145 से 155 की रफ्तार वाली गेंदों पर प्रैक्टिस करके भारतीय खिलाड़ियों को मैच में 135 से 145 की स्पीड वाले बॉलर मीडियम पेसर लगते हैं। रघु दुनिया के अकेले साइड आर्म बॉलर नहीं हैं, पर रघु दुनिया के सबसे पैशनेट और एक्यूरेट साइड आर्म बॉलर बन चुके हैं, साफ भाषा में कहें तो ये साइड आर्म बोलिंग की दुनिया के बुमराह हैं। रघु प्रैक्टिस पिच पर भी ऐसे ही गेंद फेंकते हैं जैसे वो अपना बचपन का सपना जी रहे हैं, ये उनका जुनून ही था कि 2023 के वर्ल्ड कप में जब ओस की वजह से खिलाड़ियों के जूते में मिट्टी भर जा रही थी तो रघु एक ब्रश लेकर बाउंड्री के पास खड़े हो गए, और हर ओवर के बाद वो खिलाड़ियों के जूते से मिट्टी साफ करने लगे। रघु से इंसान ये सीख सकता है कि सपने कभी नहीं टूटते,, बस सपने को पूरा करने का एक रास्ता बंद होता है, पर अगर सच में आप अपने सपने से प्यार करते हैं तो उसे पूरा करने का कोई न कोई रास्ता आप निकाल ही लेंगे।




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